रागनी
कुछ भी तो धरा नहीं, इस दुनियादारी म्हं।
क्यातैं पडग्या रै छोरे, तु इश्क बीमारी म्हं।।
तनै के बेरा ना था, ये छोरी घणी बदमाश हौवें,
प्यार-व्यार के चकरां म्हं, भले घरा के नाश होवें,
रौले झगड़ा म्हं लाग्-लाग् गोली, पड़-पड़ के नै लाश हौवें,
गोली-गोली पै मरअ् आदमी, ना सांसा म्हं सांस हौवें,
गाम-गुवांड म्हं बेइज्जती होज्या, इस गलती म्हारी म्हं।,
क्यातैं पडग्या रै छोरे, तु इश्क बीमारी म्हं।।
पडता तो ना रै भाई, वा देखण लागी सामी,
छौरे नै भी नजर घुमाई, उस रूप सलोनी कानी,
धौरे आकै वा नूं बोली, मेरा नाम सै राणी,
मैं तो भोला रहगा भाई, वा लिकडी घणी स्याणी,
उसनै मेरी एक ना मानी, इस पंचायत सारी म्हं।
़क्यातैं पडग्या रै छोरे, तु इश्क बीमारी म्हं।।
इब तो तेरअ् जचगी होगी, कोना होदां बढिया प्यार,
दो दिन का खेल रचाकै, इज्जत करदी तार-तार,
दर्द तै भीतरला् रौवे, इसी मारी दिल म्हं मार,
जिद तै मैं भी इनतै, खाउ् सूं इतणा खार,
ब्होत घणे जललिए रै, इस छोटी चिंगारी म्हं।
क्यातैं पडग्या रै छोरे, तु इश्क बीमारी म्हं।।
सन्दीप तनै मेरी आंख खोलदी, मेरअ् समझ म्हं आई,
कोनी करू प्यार किसे तै, कसम मन्नै आज खाई,
रास्ते पै तु लाया मन्नै, तु सै पक्का मेरा भाई,
भुरटाणे आले तन्नै मेरी, या नैया पार लगाई,
कंवल तनै रहणा होगा, इस चारदीवारी म्हं।
क्यातैं पडग्या रै छोरे, तु इश्क बीमारी म्हं।।
Tuesday, July 12, 2011
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