वैसे तो प्रकृति ने मानव को जीवन दिया है।
लेकिन इसने कभी-कभी, मानव जीवन भी लिया है।।
कितनों को जीवन देती ये,
कितनों का जीवन लेती ये,
प्रकृति तेरा खेल निराला,
फसलों पर गिराया पाला,
जीवन देकर तूने हम पर, एक अहसान भी किया है।
प्रकृति तेरी अजब है माया,
सारा विष्व खुषहाल बनाया,
गुजरात में जब भूकंप आया,
तूने अपना दूसरा रूप दिखाया,
कितने लोगों ने सब्र का, घूंट भी पिया है।
तूने कैसी ये करतूत दिखाई,
बिहार में है बाढ़ पहुंचाई,
मानवता तनू तार बगाई,
अब हमें माफ कर दे माई,
पानी सोखकर तू ये बतादे, मैंने ऐसा नहीं किया है।
सन्दीप कंवल भुरटाना
Tuesday, July 12, 2011
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